जब फिल्म से निकाले जाने पर फूट-फूट कर रोने लगे जीतेंद्र

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चौबे चले छब्बे बनने,दूबे बनकर आए”…… फिल्म “जीने की राह” के निर्माण के दौरान इसी कहावत को चरितार्थ किया अभिनेता जितेन्द्र ने। निर्माता टी एल वी प्रसाद ने उन्हें अपनी फिल्म “जीने की राह” में बतौर हीरो साईन किया था। चूँकि जितेन्द्र और प्रसाद के रिश्ते काफी गहरे थे इसलिए उन्होंने जितेन्द्र को इस फिल्म में काम करने के बदले बहुत मामूली रकम दी थी जिससे वो थोड़े नाखुश थे। जितेन्द्र की व्यापारिक बुद्धि दूसरे अभिनेताओं के मुकाबले थोड़ी तेज रही है। लेकिन प्रसाद के सामने उनकी ज्यादा चल नहीं पा रही थी। इसी दौरान निर्माता-निर्देशक सुबोध मुखर्जी ने अपनी एक फिल्म के लिए जितेन्द्र को भारी-भरकम रकम का ऑफर दिया जिसे जीतेन्द्र ने लपकते हुए “जीने की राह ” छोड़ दी। सुबोध मुखर्जी इस फिल्म में हेमा मालिनी को बतौर हीरोइन साईन करना चाहते थे। लेकिन हेमा मालिनी उन्हें भाव नहीं दे रही थी। मुखर्जी ने हेमा को मनाने का जिम्मा जितेन्द्र को सौंप दिया।

उन दिनों जितेन्द्र और हेमा का रोमांस जोरों पर था इसलिए हेमा द्वारा मना करने का सवाल ही नहीं था। हेमा मान गयी और मुखर्जी की फिल्म साईन कर ली। थोड़े दिनों बाद जब मुखर्जी ने इस फिल्म की आधिकारिक घोषणा की तो हीरो के रूप में संजीव कुमार का नाम देख जितेन्द्र अवाक रह गए। वो समझ गए कि हेमा को साईन करने के लिए मुखर्जी और संजीव कुमार ने उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल किया ( जितेन्द्र से पहले हेमा और संजीव कुमार का रोमांस चल रहा था लेकिन हेमा ने संजीव कुमार से रिश्ते तोड़ लिए थे और उनके साथ काम नहीं करना चाहती थी ) बहरहाल मुखर्जी और संजीव कुमार की इस चाल के सामने जितेन्द्र की चल भी क्या सकती थी। उधर “जीने की राह ” की पूरी तैयारियां हो चुकी थी लेकिन हीरो का नाम अब तक फाइनल नहीं हुआ था। भारी मन से जितेन्द्र प्रसाद के पास मिलने पहुंचे। ग्लानि से भरे जितेन्द्र प्रसाद के सामने बोले तो कुछ नहीं लेकिन उनकी डबडबाई आखों से प्रसाद सारा माजरा समझ गए। प्रसाद ने जैसे ही सहानुभूति भरा हाथ जितेन्द्र के कंधे पर रखा वो बिलख-बिलख कर रोने लगे। प्रसाद ने उन्हें चुप कराते हुए फिल्म में दोबारा साईन कर लिया। प्रसाद की इस उदारता को जितेन्द्र कभी भूले नहीं और हमेशा उन्हें फादर कहकर आदर देते रहे। प्रसाद प्रोडक्शन के लिए जितेन्द्र ने “खिलौना” विदाई ,दादी मां और उधार की ज़िन्दगी जैसी फ़िल्में की। दोनों की ये जुगलबंदी साल 2002 में प्रसाद की मौत के बाद ही समाप्त हुई।

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