‘आनंद'(Cinemaskope):हृषिकेश मुखर्जी ने क्यों बनाई फिल्म !

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हृषिकेश मुखर्जी और राजकपूर की दोस्ती उस ज़माने से थी जब मुखर्जी विमल रॉय के सहायक हुआ करते थे. विमल रॉय से अलग होने के बाद जब मुखर्जी ने बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ का निर्देशन किया जो सुपर फ्लॉप साबित हुई. फिल्म तो फ्लॉप हो गई लेकिन राज कपूर को मुखर्जी का स्टाइल बहुत पसंद आया. निर्माता एल.बी.लक्ष्मण ने जब राज कपूर को लेकर फिल्म ‘अनाड़ी’ बनाने की घोषणा की तो राज कपूर ने निर्देशक के रूप में उन्हें मुखर्जी का नाम सुझाया. लेकिन लक्ष्मण को उनका ये सुझाव पसंद नहीं आया. ‘मुसाफिर’ जैसी फ्लॉप फिल्म के निर्देशक को अपनी फिल्म की बागडोर सौंपकर वे कोई व्यवसायिक जोखिम नहीं उठाना चाहते थे. लेकिन राज कपूर मुखर्जी के नाम पर अड़ गए. और उन्हें ना लेने की स्थिति में फिल्म छोड़ देने की धमकी दे डाली. राज कपूर के इस दबाव के कारण मुखर्जी को ‘अनाड़ी’ का निर्देशन सौंपा गया.

फिल्म ‘अनाड़ी’ काफी सफल रही और इसने राज कपूर और मुखर्जी की दोस्ती को और भी पुख्ता कर दिया. इसी दरम्यान एक बार राज कपूर बीमार हो गए. उनकी बिमारी इतनी गंबीर थी कि मुखर्जी ने उनके जीवन की आशा ही छोड़ दी थी. उस बिमारी के दौरान दोस्त होने के नाते मुखर्जी ने जो पीड़ा, जो दर्द अपने जेहन में महसूस किया उसे ही उन्होंने फिल्म ‘आनंद’ में बाबु मोशाय यानि अमिताभ बच्चन के करेक्टर में उड़ेल दिया. ‘आनंद’ में अमिताभ बच्चन द्वारा निभाए गए डॉक्टर की भूमिका पर स्पष्ट रूप से हृषिकेश मुखर्जी के व्यक्तित्व की छाप देखी जा सकती है. इस तरह राज कपूर के साथ अपनी निजी संबंधों के आधार पर मुखर्जी ने ‘आनंद’ के पटकथा की परिकल्पना तैयार की.

फिल्म ‘आनंद’ के किरदार में मुखर्जी शशि कपूर को लेना चाहते थे. लेकिन शशि कपूर को स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई. इसलिए उन्होंने इसमें काम करने से मना कर दिया. मुखर्जी चाहते तो राज कपूर से अपने गहरे संबंधों का उपयोग कर शशि कपूर को इसके लिए मजबूर कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. यहाँ तक कि उन्होंने राजकपूर से भी इस बाबत कुछ नहीं कहा. अगर राजकपूर शशि कपूर को इसमें काम करने के लिए कहते तो शशि के लिए इंकार कर पाना असंभव था. शशि के इंकार के बाद मुखर्जी ने ‘आनंद’ की भूमिका के लिए राजेश खन्ना से बात की. राजेश खन्ना उस समय ‘आराधना’, ‘दो रास्ते’ जैसी सफल फिल्मों द्वारा स्टार बन चुके थे. उन्हें आनंद का किरदार काफी पसंद आया और उन्होंने हामी भर दी.

इसके बाद मुखर्जी ने आनंद का इलाज करने वाले डॉक्टर की भूमिका के लिए अभिनेताओं की तलाश शुरू की. चूँकि यह भूमिका साइड हीरो की थी तो जाहिर था कि कोई भी सफल अभिनेता इसके लिए आसानी से तैयार नहीं होता. तब मुखर्जी का ध्यान अमिताभ बच्चन की तरफ गया. अमिताभ उस समय फिल्म जगत में अपना पांव ज़माने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उनकी पिछली फिल्म ‘परवाना’ (बतौर खलनायक) सहित कुछ फ़िल्में फ्लॉप साबित हुई थी, जिसके कारण कोई भी उन्हें मुख्य भूमिका सौंपने को तैयार नहीं था. मुखर्जी जब अमिताभ से मिले तो आनंद का इलाज कर रहे बंगाली डॉक्टर की भूमिका के लिए वे एकदम उपयुक्त लगे. मुखर्जी का विश्वास था कि अमिताभ की गहरी आंखें, दमदार आवाज़ और होठों पर छाई बोलती ख़ामोशी इस डॉक्टर के अंदरूनी दर्द को उभारने के लिए एकदम उपयुक्त है. अमिताभ की इमेज में मुखर्जी अपनी प्रतिछवि देख रहे थे. इस तरह राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को लेकर मुखर्जी ने फिल्म शुरु कर दी.

साल 1971 में ‘आनंद’ प्रदर्शित हुई और ना केवल व्यावसायिक रूप से जबरदस्त सफल रही बल्कि समीक्षकों ने भी इसे मुक्त कंठ से सराहा. समीक्षकों के अनुसार, हिंदी सिनेमा के इतिहास में ‘आनंद’ शायद पहला ऐसा करेक्टर था, जिसने दर्शकों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया. एक आदमी जिसे मालूम नहीं है कि उसकी मौत निश्चित है, फिर भी वो जिंदगी के एक-एक पल का आनंद उठाना चाहता है और एक डॉक्टर जो अपने दोस्त की जिंदगी बचाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है. जबकि वो जनता है कि चिकिस्ता विज्ञान में कोई भी ऐसी दवा नहीं बनी जो उसके दोस्त की जान बचा सके. आनंद बची-खुची जिंदगी के एक-एक पल को जी रहा है, जबकि बाबू मोशाय जिंदगी के हर पल में मर रहा है. हिंदी सिनेमा में चरित्रों को शायद ही इतनी गहराई से पेश किया गया हो. फिल्म को लोगों ने काफी पसंद किया. नेशनल और पॉपुलर दोनों श्रेणी के अवार्ड फिल्म के हिस्से आये. कथावस्तु के अलावा फिल्म के संगीत ने भी इसकी सफलता में काफी अहम भूमिका निभाई. सलिल चौधरी की धुन, योगेश और गुलज़ार के गीत और लता मंगेशकर कि आवाज़ ने लोकप्रियता का परचम लहराया. इस फिल्म के द्वारा सलिल चौधरी जो अपने ऊपर लगे हत्या क आरोप से कारण पार्श्व में चले गए थे तथा गुलज़ार दोनों ही मुख्य धारा में वापस आ गए.

‘आनंद’ की सफलता ने मुखर्जी का सिक्का जमा दिया. यह फिल्म उन्होंने पूरी तरह से अपने मित्र राजकपूर को समर्पित की. जिन्होंने यह फिल्म देखि और इस बात को अच्छी तरह समझ गए कि क्यों ‘आनंद’ राजकपूर को समर्पित थी. नेशनल अवार्ड समारोह में ‘आनंद’ को उस साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया गया. पुरस्कार लेने के बाद मुखर्जी ने उसी समारोह में कहा था कि, “मेरी फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड मिला इससे कहीं ज्यादा मेरे लिए ख़ुशी की बात है कि इसी समारोह में मेरे मित्र राजकपूर को ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड दिया गया है.”

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