जब ओ पी नैयर और आशा भोसले का प्यार परवान चढ़ा

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ओमकार प्रसाद नैयर उर्फ़ ओ पी नैयर को हिंदी फ़िल्मों का मोहम्मद अली कहा जाता था. फ़िल्म संगीत के रसिया उनकी हर धुन में एक ख़ास किस्म का पंच देने की अदा पर मर मिटते थे. ओपी नैयर को छोड़ कर किसी भी भारतीय संगीतकार ने लता मंगेश्कर की आवाज़ का इस्तेमाल किए बगैर इतना सुरीला संगीत नहीं दिया है.

नैयर साहब को सिने संगीत के क्षेत्र में लाने का श्रेय गुरुदत्त की पत्नी गीता दत्त को जाता है. उनकी ही सिफारिश पर गुरुदत्त ने उन्हें आरपार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, सीआई डी और तुम सा नहीं देखा में मौक़ा दिया और इन फिल्मों में नैयर साहब ने एक के बाद एक हिट संगीत रच कर अपनी उपयोगिता साबित कर दी. लेकिन किसी बात पर नैयर और गीता दत्त में अनबन हो गयी और उन्होंने गीता दत्त को छोड़ आशा भोंसले को आगे बढ़ाने का फैसला किया.

आशा भोसले को आशा भोसले बनाने का श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है तो वो थे ओ पी नैयर. उन्होंने आशा की आवाज़ की रेंज का पूरा फ़ायदा उठाया. कई फिल्मों में एक साथ काम करने के दौरान नैयर साहब और आशा भोंसले काफी करीब आ गए लेकिन यही प्रेम सम्बन्ध नैयर साहब की बर्बादी का कारण भी बन गया.


1958 से लेकर 1972 तक नैयर और आशा भोंसले का प्रेम सम्बन्ध आगे बढ़ता रहा. एक शादीशुदा शख्स जिसके चार बच्चे हैं और एक तलाकशुदा महिला यानी आशा भोंसले खुलेआम बंबई में घूमा करते थे.”जाहिर है उस जमाने में हिंदी सिनेमा के लिए ये काफी सनसनीखेज बातें थी. ओ पी नैयर का आशा भोंसले के साथ प्रेम संबंध 14 सालों तक चला. एक ज़माने में ओ पी नैयर की कैडलक कार में घूमने वाली आशा भोंसले ने 1972 में अपने जीवन के इस संगीतमय अध्याय को ख़त्म करने का फ़ैसला किया.”इसके बाद आशा भोंसले और ओपी नैयर ने एक छत के नीचे कभी क़दम नहीं रखा. लेकिन इससे पहले उन्होंने ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ फ़िल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया, जिसे 1973 का फ़िल्म पुरस्कार मिला. आशा उस समारोह में नहीं गईं. ओपी नैयर ने उनकी तरफ़ से ट्रॉफ़ी ली. घर वापस लौटते समय उन्होंने वो ट्रॉफ़ी चलती कार से सड़क पर फेंक दी.

आशा भोंसले के साथ संबंधों के कारण नैयर साहब के परिवार वालों ने उनसे किनारा कर लिया और एक दिन आशा भोंसले भी उनकी ज़िंदगी से बाहर हो गयी. जब तक नैयर साहब को अपनी ग़लती का अहसास होता तब तक नुकसान हो चुका था. उन्होंने 94 में अपना घर, बैंक अकाउंट, कार सब कुछ छोड़ दिया और एक अनजाने परिवार में पेइंग गेस्ट की तरह रहने लगे. आशा भोंसले ने नैयर साहब की ज़िंदगी को ना खुदा मिला ना विसाले सनम जैसी बना कर रख दी. ओपी नैयर ने जहाँ प्रसिद्धि की ऊँचाइयों को छुआ, वहीं अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर गुमनामी की गहराई में भी चले गए. 28 जनवरी, 2007 को 81 वर्ष की आयु में ओ पी नैयर ने अंतिम सांस ली. लेकिन उनका संगीत कभी मर नहीं सकता.

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