बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कलाकार पृथ्वीराज कपूर 

0
344
हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा तय करने और उसे ग्लोबलाइज्ड करने में कपूर खानदान ने बड़ा अहम रोल अदा किया है. बॉलीवुड में कपूर खानदान की नींव रखने वाले अभिनेता थे- ‘पृथ्वीराज कपूर’. इनकी गिनती हिंदी सिनेमा में बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कलाकारों में की जाती है. संख्या की दृष्टि से उन्होंने भले ही काफी कम फ़िल्में की हों, लेकिन जो भी की वो मील का पत्थर मानी जाती हैं.
करियर के लिए एक्टिंग को चुनाव
3 नवंबर, 1906 को अविभाजित भारत के पंजाब स्थित लायलपुर के जमींदार घराने में जन्मे पृथ्वीराज कपूर की परवरिश ऐसे घराने में हुई है जहां एक्टिंग जैसी चीजों के प्रति बड़ा ही नकारात्मक रुझान था. बावजूद इसके पृथ्वीराज ने अपने करियर के लिए एक्टिंग को चुना जो उस समय उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था. पारिवारिक विरोध और सामाजिक अवहेलना की परवाह न करते हुए वे लाहौर के एडवर्ड कॉलेज की अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर मुंबई आ गए. मुंबई में अपने पांव जमाने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा.
छोटी-छोटी भूमिका से की शुरुआत
शुरुआत में उन्होंने छोटी-बड़ी भूमिका से की. 1930 में उन्होंने इम्पीरियल फिल्म कंपनी में नौकरी  कर ली. जिसके सर्वेसर्वा आर्देशिर ईरानी थे. इस कंपनी में काम करते हुए उन्होंने भारत की पहली टॉकी फिल्म ‘आलमआरा’ में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाई. बाद में उन्होंने इम्पीरियल फिल्म छोड़कर न्यू थियेटर्स कंपनी ज्वाइन कर ली. न्यू थियेटर्स में काम करते हुए उन्होंने  मीरा और सीता जैसी धार्मिक फिल्मों में काम किया. पृथ्वीराज का डील-डौल और उनकी आवाज़ धार्मिक फिल्मों के माफिक मानी जाती थी. न्यू थियेटर्स में छह-सात फिल्मों में काम करने के बाद उन्होंने उसे अलविदा कह दिया और रणजीत मूवीटोन ज्वाइन कर लिया. जहां उन्हें पहली बार ‘पागल’ फिल्म में एक अलग तरह का किरदार निभाने का मौका मिला. साल 1941 में सोहराव मोदी ने उन्हें अपनी फिल्म ‘सिकंदर’ में मुख्य भूमिका सौंपी. यह फिल्म पृथ्वीराज कपूर की करियर की दिशा तय करनेवाली महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई. फिल्म की धमाकेदार सफलता ने उन्हें बतौर अभिनेता स्थापित करदिया.
पृथ्वी थियेटर की स्थापना
1944 में उन्होंने पृथ्वी थियेटर की स्थापना की. पृथ्वी थियेटर पारसी थियेटरों की छाया से पूरी तरह मुक्त आधुनिक और विकासोन्मुखी नज़रिए के साथ आगे बढ़ता रहा. पृथ्वी थियेटर के बैनर तले उन्होंने ‘दीवार’, ‘पठान’, ‘गद्दार’ और ‘पैसा’ जैसे नाटकों का देशव्यापी मंचन किया और खूब ख्याति बटोरी. 1950 में वी. शांताराम की फिल्म ‘दहेज’ और 1951 में बेटे राजकपूर की फिल्म ‘आवारा’ ने उनकी शोहरत में खूब सितारे जड़े.
सबसे उल्लेखनीय फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ 
साल 1957 में उनकी सेहत ख़राब हो गई और वे अपनी आवाज़ खो बैठे. रंगमंच पर वो अपनी रोबदार आवाज़ के कारण काफी लोकप्रिय थे. इस घटना के बाद डॉक्टरी इलाज के कारण उनकी आवाज़ तो वापस आ गई लेकिन थियेटरों में उनकी वो रूचि नहीं रही. एक बार फिर उन्होंने फिल्मों पर अपना ध्यान केंद्रित किया. अभिनेता के रूप में पृथ्वीराज कपूर की सबसे उल्लेखनीय फिल्म के. आसिफ की ‘मुगल-ए-आज़म’ थी. इस फिल्म में उन्होंने शहंशाह अकबर की भूमिका निभाई .
अभिनेता से ज्यादा अभिनय की परिभाषा बदलने वाले शख्स
अपने 42 साल के करियर में पृथ्वीराज कपूर ने लगभग 55 फिल्मों में काम किया. जीवन के अंतिम दिनों में भी वे सक्रिय रहे. 29 मई, 1972 को उनका देहांत हो गया. सिनेजगत में अमूल्य योगदान के लिए उन्हें मरणोपरांत दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया. हिंदी सिनेमा के इतिहास में पृथ्वीराज कपूर एक अभिनेता से ज्यादा अभिनय की परिभाषा बदलने वाले शख्स के रूप में हमेशा याद किए जाते रहेंगे…!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here