यश चोपड़ा के उस ऑफर ने उजाड़ दी राखी-गुलजार की जिंदगी

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15 अगस्त 1951 को एक मध्यवर्गीय बांग्ला परिवार में जन्मी राखी को फिल्मों में काफी दिलचस्पी थी। मशहूर बांग्ला अभिनेत्री संध्या राय की सोहबत ने उनकी इस ख्वाहिश को परवान चढ़ाया। राखी की ख्वाहिश को देखते हुए संध्या राय ने उनकी मुलाक़ात कुछ निर्माताओं से करवाई और इस तरह बांग्ला फिल्मों से उन्होने अपने करियर का आगाज किया। 1970 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म “जीवन मृत्यु ” से हिन्दी फिल्मों में उनका आगमन हुआ।

इस फिल्म में एक प्रौढ़ विधवा का किरदार स्वीकार कर राखी ने सबको हैरान कर दिया। उनके परिचितों ने इसे करियर की दृष्टि से राखी का आत्मघाती कदम करार दिया। लेकिन राखी ने किसी की परवाह किये बगैर इस किरदार को बखूबी निभाया। अपनी दूसरी फिल्म “रेशमा और शेरा ” में छोटी सी भूमिका निभा कर उन्होंने अपने चाहने वालों को फिर निराश किया। आलोचनाओं के बावजूद राखी अपने फैसले पर अडिग रही।उनकी समकालीन अभिनेत्रियां जहाँ हिन्दी सिनेमा के परंपरागत लीक पर चलती हुई आगे बढ़ रही थी वहीं राखी ने अपने लिए जोखिम भरा रास्ता चुना। उन्हें शायद अपने आप पर पूरा कॉन्फिडेंस रहा होगा इसलिए हर फिल्म में अपनी इमेज से बाहर जाकर नयी-नयी इबारतें लिखती रही ।

“शर्मीली” ने राखी के करियर को नया मोड़ दिया। इस फिल्म में उन्होंने अपनी इमेज के साथ एक नया प्रयोग किया। इस फिल्म में उन्होंने निगेटिव शेड्स वाली भूमिका निभाई जिन्हें लोगों ने पसंद भी किया राखी का करियर आगे बढ़ रहा था। इसी दौरान उनकी मुलाक़ात गीतकार गुलजार से हुई और 1973 में दोनों ने शादी कर ली। गुलजार साहब चाहते थे कि राखी फिल्मों से दूर ही रहें लेकिन जिद्दी राखी अपने मन का करना चाहती थी.इसी बीच यश चोपड़ा ने उन्हें फिल्म “कभी-कभी ” में काम करने का ऑफर दिया जिसे राखी ने स्वीकार कर लिया लेकिन उनकी यही स्वीकृति उनके पारिवारिक जीवन की तबाही का बायस बन गयी.कभी-कभी में काम करने का फैसला राखी के जीवन का ऐसा मोड़ था जिसके परिणाम जोखिम भरे हो सकते थे लेकिन राखी ने इसकी कोई परवाह नहीं की. फिल्म तो सफल रही लेकिन इसने राखी और गुलजार के बीच नफरत की कील ठोंक दी। राखी इसके बाद भी अपना फ़िल्मी करियर आगे बढ़ाना चाहती थी और गुलजार को ये बिलकुल गंवारा नहीं था। नतीजतन परिवार में हर रोज कलह की शुरुआत हो गई और यही कलह उनके अलगाव की वजह बनी। राखी स्वभाव और फितरत से काफी स्वछन्द थी।

उन्हें किसी तरह की बंदिश पसंद नहीं थी जबकि स्वभाव से कवि और शायर गुलजार साहब की अपनी एक सोच थी। कल्पना की उड़ान उन्हें गीतों में तो पसंद था लेकिन जिंदगी में नहीं। राखी और गुलजार -दो अलग-अलग सोच और स्वभाव वाली इस बेमेल जोड़ी का जो हश्र होना था वही हुआ। बहरहाल इस अलगाव के बाद भी राखी का फ़िल्मी सफर जारी रहा। उम्र के ढलान पर राखी ने फिल्मों में मां का किरदार निभाना शुरू कर दिया और निरूपा राय के बाद सबसे सफल फ़िल्मी मां का खिताब हासिल किया।

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