UNDERRATED MOVIES OF 2017

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मनोरंजन की दुनिया में खासकर बॉलीवुड में अगर किसी फिल्म में कोई बड़ा कलाकर हो तो कहानी कैसी भी हो फिल्म हिट हो जाती है. मगर कुछ फिल्में ऐसी भी होती है जो वास्तविकता पर आधारित होती है और उन्हें सफलता नहीं मिलती. तो चलिए हम आपको बताते है वर्ष 2017 की उन फिल्मों के बारे जो बेहतरीन होकर भी कामयाब नहीं हो पाई.

फिल्म ठाकरे में बाल ठाकरे का भूमिका निभाने जा रहे नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बात करे तो कम बजट की फिल्म हरामखोर ऐसी फिल्म थी. जिसमे एक टीचर और स्टूडेंट की लव स्टोरी दिखाई गई थी. जिसके डायलॉग्स एक से बढ़कर एक हैं. कई बार तो आप हंसते-हंसते पेट पकड़ लेंगे. डायरेक्टर श्लोक शर्मा के डायरेक्शन में बनी ये फिल्म पांच सालों से रिलीज के लिए अटकी रही.  फिल्म में नवाजुद्दीन और श्वेता त्रिपाठी की परफॉर्मेंस इसकी जान है. मगर फिल्म सफल नहीं रही. इसके अलावा नवाज की माम, मानसून, बाबु मोसाय बंदूकबाज फिल्मे रही जो दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पायी.

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आई एम कलाम जैसी फिल्म बना चुके निर्देशक नील माधव पांडा की फिल्म कड़वी हवा दर्शकों को कड़वी ही लगी. कहानी एक गांव की है. फिल्म जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर आधारित है. जहां सूखा पड़ने से लोग पीड़ित है. किसानों की खेती बारिश की कमी की वजह से बर्बाद हो चुकी है. किसान कर्ज तले दबे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं. इस क्षेत्र में बैंक की तरफ से कर्ज वसूली के लिए एजेंट आता है जिसे वहां के लोग यमदूत बोलते हैं क्योंकि जब-जब वो गांव में आता है कोई न कोई अपनी जान दे देता है. फिल्म में दिव्यांग पिता के रोल में संजय मिश्रा हैं और वसूली एजेंट के रोल को निभाया है रणवीर शौरी ने. वास्तविकता पर आधारित ये 99 मिनट की कहानी भी दर्शकों जुटा नहीं पायी.

समाज में हिंदी और अंग्रेजी भाषा में बोलचाल को लेकर फैली विसंगतियों को आधार मानकर बनायीं गयी फिल्म इंग्लिश मीडियम भी अपने आप में अच्छी और वास्तविक मानसिकताओं पर आधारित फिल्म थी. मगर फिल्म दर्शकों की  मानसिकता को बदलने में कामयाब नहीं रही. फिल्म इस बात को बारीकी से उठाती है कि अंग्रेजी माध्यम और महंगे स्कूलों की होड़ में माता-पिता बिना सोचे-समझे शामिल हो जाते हैं, मानो इन स्कूलों में दाखिला होते ही उनके बच्चे बड़े आदमी बन जाएंगे. वे इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. यह स्टेटस सिंबल का भी प्रतीक होता है. साथ ही अंग्रेजी न आने पर हीन भावना से ग्रसित होने की मनोदशा को भी फिल्म में व्यंग्यात्मक तरीके से दर्शाया गया है.

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स्वरा भास्कर की ‘अनारकली ऑफ आरा’ एक स्टेज परफॉर्मर की जिंदगी की कहानी दिखाती है. अपने साथ हुई छेड़खानी के खिलाफ आवाज उठाती ‘अनारकली’ कई लोगों की आंखों में खटकती है. लेकिन वह हार नहीं मानती और आगे बढ़ती है. स्वरा भास्कर की एक्टिंग और डायलॉग डिलिवरी इस फिल्म में जान डालती है. मगर ये फिल्म भी दर्शकों के जुटाने में कामयाब नहीं हो पायी.

समाज में पारिवारिक जीवन में मन मुटाव पर आधारित फिल्म मुक्ति भवन में एक पिता बनारस में देह त्यागना चाहता हैं और बेटे को घर के साथ-साथ दफ्तर भी संभालना है. आदिल हुसैन की इस फिल्म में आदिल अपनी एक्टिंग से इंप्रेस करते हैं. हर मोड़ पर फिल्म चौंका देती है. आप इसे देखते-देखते कई तरह की एंडिंग के बारे में सोचने लगेंगे. मगर फिल्म को मुक्ति नहीं मिली.

कोंकणा सेन शर्मा के डायरेक्शन में बनी ‘ए डेथ इन दि गंज’ को देखने का एक्सपीरियंस तो ऐसा है मानो आप कोई नॉवल पढ़ रहे हो. अच्छा ट्रीटमेंट बेहतरीन परफॉर्मेंस और ऐसा क्लाइमैक्स जो आपको हैरान कर दे. यह फिल्म केवल वन टाइम वॉच न होने के बाद भी कम चल पाई.

समाज के ज्वलंत मुद्दे से जुड़ी वास्तविकता को दर्शाती अज्जी फिल्म में एक रेप पीड़िता बच्ची और दादी के संघर्ष की कहानी है. दर्द से गुजरती बच्ची और फिर उसका बदला लेने के लिए खुद को तैयार करती दादी की हिम्मत और हौसला हिला कर रख देता है. इस फिल्म को देवाशीष मखीजा ने डायरेक्ट किया था. बावजूद इसके फिल्म ज्यादा चर्चा का विषय नहीं रही.

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