नायक नहीं खलनायक है तू..! BOLLYWOOD AAJKAL

0
332

बॉलीवुड में ऐसे कई अभिनेता रहे हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत बतौर विलेन की थी. जिसमें विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे अभिनेताओं ने एक खलनायक के तौर पर खूब लोकप्रियता बटौरी. वैसे इस फेहरिस्त में कई ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने शुरुआत तो बतौर हीरो की, लेकिन बाद में बाद में विलेन बनने पर मजबूर होना पड़ा. फिल्म सफल होने के बावजूद वो दर्शकों का दिल नहीं जीत पाए.

सबसे पहले जिक्र गोविंदा का. दर्जनों हिट फिल्म देने के बाद भी जब गोविंदा का फिल्मी करियर ख़त्म होने की कगार पर पहुंच गया, तो उऩ्होंने वापसी के लिए यशराज की फिल्म ‘किल दिल’ का सहारा लिया. जिसमें वो भैयाजी के निगेटिव किरदार में नज़र आए. गोविंदा को ये उम्मीद रही होगी कि उनके इस नए अवतार को दर्शक पसंद करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दर्शक गोविंदा को विलेन के रूप में पचा नहीं पाए. फिल्म फ्लॉप रही और गोविंदा के मंसूबों पर पानी फिर गया.

रितेश देशमुख हालांकि अब भी फिल्मों में हीरो ही बने नजर आते हैं, लेकिन मल्टीस्टारर फिल्म में उनकी जगह कोई और ही ज्यादा तालियां बटोर ले जाते हैं. सोलो हीरो ना बन पाने के अपने गम को रितेश ने फिल्म ‘एक विलेन’ के निगेटिव किरदार से गलत करना चाहा. फिल्म तो चल गई लेकिन रितेश देशमुख न हीरो रहे ना विलेन,. रितेश अब स्टारों की भीड़ में या फिर सेमी एडल्ट फिल्मों से अपनी गाड़ी खींच रहे हैं.

राजकुमार के साहबजादे पुरु राजकुमार को प्रकाश मेहरा ने करिश्मा कपूर जैसी बड़ी हीरोइन के साथ बॉलीवुड में फिल्म ‘बाल ब्रह्मचारी’ के जरिए लांच किया. संवाद अदायगी के बेताज बादशाह के इस लल्लू राजकुमार को देखकर दर्शकों का जायका ही बिगड़ गया. बावजूद इसके राजकुमार के क्रेज को दर्शकों ने आख़िरी सलामी दी और फिल्म तो चल गयी लेकिन पुरु राजकुमार नहीं चल पाए. बाद में उन्होंने ‘हमारा दिल आपके पास है’ के निगेटिव किरदार से वापसी की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. आखिरी बार वो अजय देवगन की फिल्म ‘एक्शन जैक्शन’ में एक एक्स्ट्रा के रोल में नजर आये, जो ना के बराबर ही था.

सुनील शेट्टी का करियर जब ढलान पर आया तो उन्होंने फिल्मों से संन्यास लेने के बजाय अपने बैनर तले ही फिल्म बना ली और उसमें अजय जडेजा के सामने विलेन बन गए. लेकिन ‘खेल’ का ये खेल दर्शकों को समझ में नहीं आया. ना फिल्म चली और ना ही सुनील शेट्टी की वापसी हो सकी.

किरण कुमार ने अपनी शुरुआत फिल्म ‘दो बूंद पानी’ (1971) से बतौर हीरो की थी और दर्जनों फिल्मों में हीरो ही बनते रहे. हिंदी फिल्मों में दाल ना गलत देख उऩ्होंने गुजराती फिल्मों का रुख किया और कामयाब रहे. उन्हें गुजराती फिल्मों का अमिताभ माना जाता था, लेकिन हिंदी फिल्मों में उनकी कोई पूछ नहीं थी. राकेश रोशन की फिल्म ‘खुदगर्ज’ से उन्होंने धमाकेदार वापसी की और काफी सफल रहे. लेकिन सफलता का ये दौर ज्यादा लंबा नहीं चला. आजकल किरण कुमार टीवी पर छोटे-मोटे रोल कर अपनी गाड़ी खींच रहे हैं.

1993 में फिल्म ‘बेकरार’ से अपनी शुरुआत करने वाले मोहनीश बहल ने कई फिल्मों में काम किया लेकिन कामयाब नहीं हुए. इससे पहले कि मोहनीश गुम हो जाते राजश्री प्रोडक्शन ने उन्हें सलमान खान के साथ ‘मैंने प्यार किया’ से बतौर विलेन रीलॉन्च किया. फिल्म तो कामयाब रही लेकिन मोहनीश की रूठी किस्मत नहीं मानी. शायद दर्शकों ने अभिनेत्री नूतन के इस बेटे को खलनायक के रूप में स्वीकार ही नहीं किया.

इसी तरह फिल्म ‘ढिशुम’ में अक्षय खन्ना का निगेटिव किरदार काफी चर्चों में रहा.
वैसे अक्षय खन्ना के खाते में कई कामयाब फ़िल्में दर्ज हैं. अपनी आखिरी फिल्म ‘गली गली में चोर है’ की नाकामयाबी के बाद अक्षय गुम हो गए (ठीक वैसे ही जैसे उनके पिता विनोद खन्ना गुम हो गए थे) 4 साल बाद अक्षय ने बतौर विलेन अपनी वापसी किया. लेकिन शायद ही कोई मानेगा कि हीरो से विलेन बनने के लिए उऩ्होंने जो फिल्म चुनी है, वो उनके करियर को स्टैब्लिश कर पाई.

कला फिल्मों से मुख्य धारा की फिल्मों में जगह बनाने के लिए ओमपूरी, नसीरूद्दीन शाह और सदाशिव अमरापुरकर जैसे अभिनेताओं ने बतौर विलेन ही अपनी शुरुआत की लेकिन व्यवासायिक फिल्मों में इनका कोई इमेज नहीं होना इनके लिए वरदान साबित हुआ और ये कामयाब रहे.

वैसे विलेन की फहरिस्त में अभिनेत्रियां भी काम नहीं हैं. यहां अभिनेत्री अनु अग्रवाल का जिक्र भी मौजूद है. महेश भट्ट की महाकामयाब फिल्म ‘आशिकी’ से इंडस्ट्री में कदम रखने वाली अनु ने अपनी हरकतों से दर्शकों को निराश कर दिया. नौबत ‘खलनायिका’ बनने की आ गई, लेकिन दर्शकों ने ऐसा हूट किया कि गुमनामी के अंधेरे में खो गई अनु अग्रवाल..

बुझते दीये की भभकती लौ की तरह रेखा ने फिल्म ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ में सारी हदें लांघ दी. नाराज दर्शकों ने उनकी 29 साल की सफल पारी का लिहाज ना करते हुए उन्हें घर बिठवा दिया. रेखा को खलनायिका के तौर पर देखना दर्शकों के लिए किसी सदमे से कम नहीं था. फिल्म तो हिट रही लेकिन रेखा का पूरा करियर ही फ्लॉप हो गया.

आखिर क्या वजह है कि हीरो को विलेन के रूप में दर्शक स्वीकार नहीं करते. शायद दर्शक दिलो-दिमाग में बैठी अभिनेताओं की छवि को  ट्रांसफॉर्म होते पचा नहीं पाते. यहां भी फर्स्ट इम्प्रेशन इज लास्ट का फर्मूला ही काम करता है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here