संगीत के सारथी सी रामचन्द्र

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चालीस-पचास के दशक में हिन्दी फिल्म संगीत को पारम्परिकता की चौखट से निकाल कर उसे नयी लीक पर आगे ले जाने वाले संगीतकारों में सी रामचन्द्र का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. अपने दौर में नौशाद साहब फ़िल्मी संगीत को लोक धुनों से जोड़कर नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे थे तो वहीं दुसरे संगीतकारों ने शास्त्रीयता का दामन थाम रखा था लेकिन इस दौर सी रामचन्द्र पारम्परिक साजों के जरिये ही नए प्रयोग शुरू किये जो उस दौर में ताजी हवा के झोंके की तरह महसूस किया गया. लीक से हटकर बनी उनकी धुनों ने धूम मचा दी. सी रामचन्द्र ने हिन्दी फिल्म संगीत की मूल आत्मा को बरकरार रखते हुए विदेशी धुनों के मिश्रण से एक नयी संगीत शैली की शुरुआत की जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. उनका पूरा संगीत सफर नए-नए शैली से सरोबार है. इसलिए उन्हें हर तरह की धुनों का उस्ताद भी माना जाता है.

12 जनवरी, सन 1918 में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के एक छोटे-से गांव ‘पुंतबा’ में जन्मे सी रामचन्द्र दरअसल एक्टिंग में अपना भाग्य आजमाना चाहते थे. इसी ख्वाहिश ने उन्हें सोहराब मोदी के सामने ला खड़ा किया. मोदी को सी रामचन्द्र की एक्टिंग तो पसंद नहीं आयी लेकिन उनकी आवाज उन्हें जम गयी इसलिए उन्होने रामचन्द्र को एक्टिंग के बजाय म्यूजिक में हाथ आजमाने की सलाह दी. मोदी की सलाह को मानते हुए रामचन्द्र ने एक्टिंग का मोह छोड़ कर संगीत पर अपना ध्यान फोकस करना शुरू किया सोहराब मोदी ने अपनी फिल्म निर्माण कंपनी ‘मिनर्वा मूविटोन’ के संगीतकार ग्रुप में शामिल कर लिया. अब वे ग्रुप में बतौर हारमोनियम वादक काम करने लगे थे. मिनर्वा मूवीटोन को छोड़कर सी रामचंद्रन ने स्वतंत्र रूप से संगीत देना शुरू किया. 1942 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘सुखी जीवन’ की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र कुछ हद तक बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए. इसके बाद , उनमें ‘सावन’ ‘शहनाई’ ‘पतंगा’ ‘समाधि’ और ‘सरगम’ जैसी फिल्मों का संगीत रचा. इनमे कई गीत काफी लोकप्रिय भी हुए लेकिन सही मायने में सी रामचन्द्र की सफलता शुरुआत 1951 आई भगवान दादा की फ़िल्म ‘अलबेला’ से हुई. वैसे तो फ़िल्म ‘अलबेला’ में उनके संगीतबद्ध सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन ख़ासकर “शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के”, “भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे”, “मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन” आदि गीतों ने धूम मचा दी. सी रामचन्द्र द्वारा दिए गए इन गीतों को आज भी बड़े शौक से सूना जाता है. संगीत के इतिहास में ये धुन कालजयी माने जाते हैं. भारतीय साजों के साथ विदेशी ट्यून का लाजवाब मिश्रण अलबेला के गानों की खासियत थी. लोगों को ये धुनें भा गयी और इसके साथ ही सी रामचंद्रन का सितारा भी सातवें आसमान पर जा पहुंचा.

सी रामचन्द्र और लता मंगेशकर की जुगलबंदी ने हिंदी फिल्म संगीत को गौरवान्वित होने के कई मौके मुहैया करवाये. सी रामचन्द्र की धुनें और लता जी के स्वर ने उस दशक में ऐसा तिलस्म रचा जिससे निकलने में हिंदी सिनेमा को सालों लग गए. शुरुआत में नूरजहाँ सी रामचन्द्र की पहली पसंद थी लेकिन उनके पाकिस्तान चले जाने के बाद उनके विकल्प के तौर पर उन्होने लता जी को आजमाया. समाधि , कवि , परछाई और मीनार और अनारकली जैसी फिल्मों में हुई दोनों दिग्गजों की जुगलबंदी हिन्दी फिल्म संगीत की अमूल्य धरोहर की तरह हैं. दरअसल सी रामचन्द्र और लता जी के सम्बन्ध व्यसायिकता से आगे बढ़ते हुए निजी आकर्षण का रूप ले चुके थे. ऐसा आकर्षण जिसकी कोई मंजिल उन्हें नज़र नहीं आती थी. इस दर्द को धुनों में ढाल कर सी रामचन्द्र ने लता के गले से ही लोगों के सामने रखा. बहरहाल निजी जिंदगी धीरे-धीरे उनकी धुनों पर भी हावी होती चली गयी और सी रामचन्द्र के धुनों का आकर्षण धीरे धीरे काम होने लगा. दौर बदल रहा था. पाश्चात्य संगीत भारतीय संगीत पर अपनी पकड़ तेजी से मजबूत करती जा रही थी. इस बदलते दौर में सी रामचन्द्र कहीं पीछे छूटते से जा रहे थे. वक़्त को भांपते हुए 1953 में सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और ‘न्यू सांई प्रोडक्शन’ का निर्माण किया, जिसके बैनर तले उन्होंने ‘झांझर’, ‘लहरें’ और ‘दुनिया गोल है’ जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया. लेकिन ये उनका दुर्भाग्य ही था कि इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं सकी. इसके बाद सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली और अपना ध्यान संगीत की ओर जी लगाना शुरू कर दिया. वर्ष 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘नास्तिक’ में उनके संगीतबद्ध गीत “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान”, समाज में बढ़ रही कुरीतियों के उपर उनका सीधा प्रहार था. इस गीत की प्रसिद्धि ने उन्हें फिर से लोकप्रिय बना दिया. 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘तलाक’ और ‘1959’ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘पैग़ाम’ में उनके संगीतबद्ध गीत “इंसान का इंसान से हो भाईचारा….” की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक बार फिर से अपनी खोयी हुई लोकप्रियता पाने में सफल हो गए. भारत के वीर जवानों को श्रद्धाजंलि देने के लिए कवि प्रदीप ने 1962 में “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी..” गीत की रचना की. इस गीत का संगीत तैयार करने की जिम्मेंदारी उन्होंने सी. रामचन्द्र को सौंप दी. सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में एक कार्यक्रम के दौरान स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण इस गीत को सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखों में आँसू छलक आए थे. “ऐ मेरे वतन के लोगों..” गीत को संगीत देकर सी. रामचन्द्र ने जैसे इस गीत को अमर बना दिया. आज भी भारत के महान देशभक्ति गीत के रूप में याद किया जाता है.

सी. रामचन्द्र ने अपने चार दशक के लंबे सिने करियर में लगभग 150 फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया. हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त उन्होंने तमिल, मराठी, तेलुगू और भोजपुरी फ़िल्मों को भी संगीतबद्ध किया।सी रामचन्द्र ने अपने म्यूजिक में जितनी विविधता का परिचय दिया उसका जोड़ मिल पाना मुमकिन नहीं. उन्होने हर दौर और हर वर्ग का म्यूजिक रचा यही वजह है आज भी उनकी धुनें उतनी ही लोकप्रिय हैं जितनी उस दौर में थी. 5 जनवरी 1982 में उनकी मौत के साथ ही हिन्दी फिल्म संगीत का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गए चितलकर रामचन्द्र की अमर धुनें उन्हें संगीत रसिकों के जेहन में हमेशा जीवित बनाये रखेगी.

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