अपनी ही सफलता का शिकार हो कर रह गए रमेश सिप्पी

0
250

अमूमन कामयाबी ज़िंदगी में जोश और ऊर्जा भर्ती है ताकि इंसान बेहतर से बेहतरीन मंजिलें फतह करे लेकिन रमेश सिप्पी के मामले में ये चक्र उलटा ही घूमता नज़र आया। शोले जैसी फिल्म की कामयाबी के बाद रमेश सिप्पी से सिनेमा को जो बड़ी उम्मीदें पैदा हो गयी उसने उनके करियर को समय से पहले ही ढलान पर लाकर खड़ा कर दिया वो आज भी रमेश सिप्पी अपनी ही खींची लकीर से बड़ी लकीर खींचने के सपने संजोये हुए हैं। बावजूद इसके उनके सिनेमाई योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। निर्माता निर्देशक रमेश सिप्पी के बारे में कहा जाता रहा है की वो अपनी फिल्म में स्टारों को भरकर दर्शकों में अपनी फिल्म के लिए एक विशेष आकर्षण जगाने में माहिर रहे हैं। लेकिन सच्चाई तो ये है कि जिन-जिन अभिनेताओं ने उनकी फिल्म में काम किया हो अभिनेता से स्टार हो गए। मसलन सिप्पी और हिंदी सिनेमा की मास्टरपीस फिल्म शोले को ही लें तो इस फिल्म में काम करने से पहले न तो अमजद खान को कोई जानता था और ना ही जगदीप को। अमिताभ बच्चन भी कोई बहुत बड़े स्टार नहीं थे। धर्मेन्द्र और संजीव कुमार जरूर थोड़े बड़े नाम थे। लेकिन शोले की कामयाबी के बाद इस फिल्म में काम करने वाले छोटे कलाकार भी स्टार बन गए। रमेश सिप्पी को मल्टीस्टारर फिल्ममेकर की बजाय किंग मेकर निर्देशक कहना ज्यादा उचित है।

22 जनवरी 1947 को में कराची में जन्मे मेश सिप्पी फिल्म निर्माता-वितरक तथा फिल्म इंडस्ट्री के बरसों तक लीडर रहे जी पी सिप्पी के बेटे हैं।जीपी सिप्पी खुद ही एक बड़े निर्माता थे। फ़िल्मी माहौल में पले – बढे रमेश सिप्पी ने जल्द ही फिल्म निर्माण और निर्देशन की बारीकियां सीख ली.1971 में उन्होने फिल्म अंदाज़ से अपनी फ़िल्मी पारी का आगाज़ किया। इस फिल्म में उन्होंने उस दौर के सुपरस्टार्स राजेश खन्ना, हेमा मालिनी और शम्मी कपूर जैसे सितारे मौजूद थे। विरासत में मिली फ़िल्मी बारीकियां उनके काम आई और उनकी पहली ही फिल्म ने कामयाबी का परचम फहरा दिया। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने सफलता दर्ज की और रमेश फिल्म जगत में स्थापित हो गए। इसके बाद हेमा मालिनी को डबल रोल देते हुए उन्होंने सीता और गीता के रूप में दो विपरीत स्वभाव की बहनों का अनूठा चित्रण किया। यह फिल्म नायिका प्रधान थी और इस तरह की फिल्म बनाना व्यवसाय की दृष्टि से रिस्की था। लेकिन रमेश ने यह जोखिम उठाया और सीता और गीता सुपरहिट रही।
लगातार दो सफल फिल्म देने के बाद रमेश सिप्पी का उत्साह और बढ़ गया। उन्होंने ‘शोले’ जैसी भव्य फिल्म बनाई। रिलीज होने के बाद शोले ने तो इतिहास ही रच दिया।

40 सालों बाद भी शोले का क्रेज दर्शकों में मौजूद है। आज भी फिल्म के अनेक किरदार ‘लार्जर देन लाइफ’ होकर फिल्म दर्शकों के बीच बने हुए हैं। मसलन गब्बरसिंह, बसंती, सांभा, जय-वीरू, सूरमा भोपाली को गाहे-बगाहे याद किया जाता है। फिल्म लेखकों की जोड़ी सलीम-जावेद के कलम से लिखी गई चुस्त पटकथा, चुटीले संवाद और दृश्य संयोजन कुछ इस तरह से परदे परदे पर प्रस्तुत हुए कि उन्हें भूल पाना मुश्किल है। इसीलिए फिल्म ‘शोले’ को ऑल टाइम ग्रेट माना जाता है। एक निर्देशक के रूप में ‘शोले’ की हर फ्रेम पर रमेश सिप्पी का असर नजर आता है। न केवल उन्होंने अपने हर कलाकार से बेहतरीन अभिनय करवाया बल्कि हर सीन को इस तरह पेश किया कि दर्शक मंत्र-मुग्ध हो जाते हैं। आने वाले कई वर्षों तक शोले की चर्चा होती रहेगी और इस बहाने रमेश सिप्पी को हमेशा याद किया जाता रहेगा।।शोले के रूप में रमेश सिप्पी ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी कि हर बार उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों की तुलना ‘शोले’ से होने लगी। कलात्मक दृष्टि से भी और व्यावसायिक दृष्टि से भी। शोले की सफलता रमेश पर भारी पड़ने लगी और वे एक तरह के दबाव में आ गए। शोले की अपार सफलता और मुंबई के मेट्रो सिनेमा में लगातार 5 वर्षों से अधिक चलकर रिकॉर्ड बनाने वाली फिल्म के बाद उनकी शान भी बड़े बजट और बहुल सितारों से लकदक थी। शोले की तुलना में शान बेहद मामूली फिल्म थी और यह फ्लॉप हो गई। निर्देशन की दृष्टि से भी शान रमेश की कमजोर फिल्म थी। इसके बाद सलीम जावेद की जोड़ी द्वारा लिखित शक्ति रमेश सिप्पी ने निर्देशित की। पहली बार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे मेगा स्टार साथ में आए। उन्होंने पिता-पुत्र के रोल में बेहतरीन अभिनय किया। रमेश सिप्पी का निर्देशन भी कसा हुआ था। एक अच्छी फिल्म होने के बावजूद शक्ति को बॉक्स ऑफिस पर खास सफलता नहीं मिली। रमेश ने ट्रेक चेंज करते हुए अपनी अगली फिल्म में एक्शन की बजाय प्रेम कहानी को महत्व दिया और ऋषी कपूर और डिम्पल कपाड़िया के साथ फिल्म सागर का निर्माण शुरू किया। फिल्म में कमल हासन को भी लिया गया। फिल्म की कहानी में नयापन नहीं था, लेकिन रमेश सिप्पी ने एक कविता की तरह फिल्म को पर्दे पर पेश किया। लेकिन सागर को भी औसत सफलता मिली।

दरअसल रमेश सिप्पी खुद अपनी सफलता का शिकार बनकर रह गए। महान रचना की नहीं जाती बल्कि कभी कभी हो जाती है। रमेश सिप्पी भी इस फिलॉसफी को समझ गए। अपनी अच्छी फिल्मों को भी सफलता नहीं मिलते देख निराश उन्होने छोटे परदे की ओर रुख किया। विभाजन की त्रासदी पर बुनियाद धारावाहिक भव्य पैमाने उन्होंने बनाया और धारावाहिकों की दुनिया में नए पैमाने स्थापित किए। लेकिन टीवी उन्हें ज्यादा दिनों तक बाँध कर नहीं रख पाया। उनकी कल्पना की उड़ान के लिए जब छोटा पर्दा छोटा साबित होने लगा तो वो फिर फिल्मों की और लौटे लेकिन उनकी वापसी काफी असफल साबित हुई। 1989 में उन्होने मिथुन चक्रवर्ती को लेकर ‘भ्रष्टाचार’ बनायी जो फ्लॉप रही। 1991 अमिताभ को लेकर बनी ‘अकेला’ भी अकेली ही नज़र आयी.लेकिन सिप्पी ने हार नहीं मानी और शाहरुख खान को लेकर ‘जमाना दीवाना’ से वापसी की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। इन फिल्मों की असफलता से रमेश टूट गए और पिछले 15 वर्षों से उन्होंने कोई फिल्म नहीं बनाई।बहरहाल रमेश सिप्पी में अभी भी काफी ऊर्जा बाकी है। उम्मीद है कि वो फिर से कोई नयी कोशिश करेंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here