Rajesh Khanna (पार्ट-1) : कलाकार नहीं चमत्कार थे राजेश खन्ना

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राजेश खन्ना को एक व्यक्ति या स्टार कहने से बेहतर है कि उन्हें एक चमत्कार कहा जाए. ऐसा चमत्कार जो हमेशा नहीं होते. सिनेमा ने स्टार तो कई देखे लेकिन राजेश खन्ना जैसा मास हिस्टीरिया सबको नसीब नहीं हो सकता. उनके बालों का स्टाइल हो, या गुरु कॉलर वाली शर्ट पहनने का तरीका या पलकों को हल्के से झुकाकर गर्दन टेढ़ी कर निगाहों के तीर छोड़ने की अदा… उन्होंने सिनेमा प्रेमियों की पूरी एक पीढ़ी को सम्मोहित कर रखा था.

जेपी सिप्पी साहब की फ़िल्म ‘राज’ से बॉलीवुड में उनकी एंट्री हुई लेकिन चेतन आनंद की ‘आख़िरी खत’ पहले रिलीज़ हुई और फ्लॉप हो गई. जिस फ़िल्म ने राजेश खन्ना को राष्ट्रीय पहचान दी, वो थी ‘आराधना’. यूं तो ये फिल्म बनाई गई थी शर्मिला टैगोर के लिए, लेकिन इसने ‘लॉन्च’ किया राजेश खन्ना को. इसके बाद जो हिट फ़िल्मों का सिलसिला शुरू हुआ. 13-14 लगातार हिट फ़िल्में, जिसकी मिसाल आज तक नहीं मिलती. अचानक एक लड़का आया और पूरी फ़िल्मी दुनिया पर छा गया. उनकी हर फ़िल्म ‘जुबली हिट’ और ‘ब्लॉकबस्टर’ हो रही थी.

राजेश खन्ना का 69 से लेकर 75 तक का समय पूरी तरह खन्ना का था. राजेश खन्ना की लोकप्रियता जहां तक गई थी, वहां तक किसी की नहीं गई. कारण ये था कि लोग उनके साथ अपने आप को आइडेंटिफ़ाई करते थे और उनकी मुस्कान लड़कियों को बहुत आकर्षित करती थी. उनकी आवाज़ बहुत अच्छी थी और उनकी फ़िल्मों को संगीत बहुत अच्छा मिला. कहावत है कि – “कामयाबी को हजम कर पाना कामयाब होने से भी बड़ी कला है”. इस कला में खन्ना फेल हो गए. वो साल में दस फिल्में किया करते थे. उनका तर्क था कि मैं अपने प्रशंसकों को ज़्यादा से ज़्यादा नज़र आऊं. उनमें अहंकार शुरू से था. जब कामयाबी आई तो वो बढ़ता चला गया और इसके साथ ही उनकी नाकामयाबी का दौर भी शुरू हो गया.

अपने जीवन के आख़िरी चरण में राजेश खन्ना बहुत एकाकी हो गए. उन्हें कैंसर ने जकड़ लिया. पत्नी डिंपल से पहले ही अलग हो चुके थे. एकाकीपन मिटाने के लिए सीरियल और छोटी-छोटी फिल्मों में काम करते रहे. जमाना बदला, फिल्मों का अंदाज बदला लेकिन राजेश खन्ना नहीं बदले जो अंततः उनकी तबाही का कारण बना. आखिरकार 18 जुलाई, 2012 को वो इस एहसानफरामोश इंडस्ट्री को कोसते हुए दुनिया को अलविदा कह गए.

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