आमिर खान क्यों हैं बॉलीवुड के मि. परफेक्शनिस्ट..?

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आमिर खान में अपने काम को लेकर काफी जुनूनी माने हैं. निजी जीवन हो या परदे पर उनके द्वारा निभाया जाने वाला किरदार.. आमिर खान को हर चीज एकदम चुस्त-दुरुस्त और अपडेट चाहिए,यही वजह है कि बॉलीवुड में उन्हें मि. परफेक्शनिस्ट के नाम से भी जाना जाता है. आमिर खान अपने किरदार को केवल निभाते नहीं बल्कि उसे जीते हैं. पात्रों की आत्मा उनपर इस कदर सवार रहती है कि आमिर किसी भी फिल्म में काम करते समय उस किरदार को पूरी तरह ओढ़ लेते हैं. मंगल पाण्डेय और गज़नी के समय उनका हेयर स्टाइल उनके इस अद्भुत जूनून का परिचय देते थे. आमिर एक ऐसे कलाकार हैं जो फिल्म की हर विधा में पारंगत हैं. निर्माण से लेकर मार्केटिंग तक आमिर की कोई सानी नहीं. अपने चाचा नासिर हुसैन से फिल्म की बारीकियां सीखने वाले आमिर जितने बड़े स्टार हैं उतने ही बड़े कलाकार भी. एक्टिंग से लेकर बॉक्स ऑफिस तक उनकी तूती बोलती है. उम्र के 53 वें पड़ाव पर पहुंच चुके आमिर के फ़िल्मी करियर पर डालते हैं एक नजर…

14 मार्च, 1965 में जन्मे आमिर खान ने 1973 में अपने चाचा नासिर हुसैन की फिल्म ‘यादों की बरात’ से बतौर चाइल्ड एक्टर अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी. साल 1984 में केतन मेहता की फिल्म ‘होली’ में पहली बार एडल्ट रोल में नजर आए, लेकिन उनके लिए सफलता के द्वार खोले ‘क़यामत से क़यामत तक’ ने. इस फिल्म से आमिर युवाओं के बीच रोल मॉडल बनकर उभरे. नब्बे के दशक का देश का युवा वर्ग जब दिशाहीन होता जा रहा था, तब आमिर खान ने अपने आगमन से उनके सपनों को आकार दिया. युवा वर्ग परदे पर जो देखना चाहता था, उसे फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ के माध्यम से प्रस्तुत किया. आधुनिक रोमियो-जूलियट अंदाज में आई इस फिल्म से आमिर ‘नेक्स्ट-डोअर’ पड़ोसी लड़के की तरह युवा वर्ग के चहेते बन गए. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट मेल डेब्यू अवॉर्ड मिला था.

उसके बाद उन्होंने फिल्म ‘राख’ में काम किया, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. अपनी पहली ही फिल्म में फिल्मफेयर अवार्ड जीतने वाले आमिर खान ने शुरु से ही एक फंडा अपना रखा है कि बेशक वह साल में एक ही फिल्म करें, लेकिन वह एक ही फिल्म साल की सभी फिल्मों से अलग और बेहतरीन होती हैं. फिल्म ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘हम हैं राही प्यार के’ जैसी फिल्मों ने आमिर खान को बॉलीवुड के शीर्ष एक्टरों में ला खड़ा किया. साल 1996 में आई फिल्म ‘राजा हिन्दुस्तानी’ आमिर खान की सबसे बड़ी हिट फिल्म मानी जाती है. इस फिल्म के लिए उन्हें पहली बार फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला. ‘राजा हिन्दुस्तानी’ से पहले आमिर खान को सात बार फिल्मफेयर के लिए नामांकन मिला पर हर बार उन्हें मायूसी ही हाथ लगी. और शायद यही वजह रही कि बार-बार नामांकन हासिल करने के बाद भी आमिर खान किसी भी अवार्ड फंक्शन में नहीं जाते. उनका मानना है भारतीय सिनेमा अवार्ड्स में पारदर्शिता की कमी है.

‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘सरफ़रोश’, ‘मन’, ‘फ़ना’, ‘गजनी’, ‘3 इडियट्स’, ‘धूम-3’, ‘पीके’ और ‘दंगल’ जैसी फ़िल्में आमिर के करियर के शानदार नगीने हैं, जो हर तरह से एक मास्टरपीस फिल्म कहलाने के लायक हैं. फिल्म ‘लगान’ आमिर खान की ऐसी ऑल टाइम ग्रेट मास्टर पीस पीरियड फिल्म है, जो देश से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मंच पर सराही एवं पसंद की गई. ऑस्कर के लिए नामांकन एक उपलब्धि है. देश के बिजनेस मैनेजमेंट इंस्टीट्‍यूशंस में ‘लगान’ को लेकर शोध प्रबंध प्रस्तुत किए गए और कक्षाओं में उसे ‘टेक्स्ट फिल्म’ की तरह पढ़ाया-समझाया गया.

अपने ‘पावर हाउस परफार्मेंस’ से आमिर खान हर फिल्म में दर्शकों को लुभाते रहे हैं. उनकी संवेदनशीलता उनका ऐसा निजी गुण है, जिससे आमिर ने अपने समकालीन नायकों को तेजी से पीछे छोड़ दिया. कम फिल्मों में काम करना और बेहतर किरदारों का सावधानी से चयन उनकी विशेषता रही है. अपने बोंसाई कद के बावजूद उनके द्वारा निभाए गए किरदार ‘लार्जर देन लाइफ’ साबित हुए हैं, इसीलिए आमिर को ‘परफेक्शनिस्ट एक्टर’ माना जाता है.

आमिर खान की सबसे बड़ी क्षमता है अपने चरित्र को जीवंत बना देना. यही वजह रही है कि फ्‍लॉप या नए डायरेक्टर आमिर की उपस्थि‍ति से सुपरहिट की श्रेणी में आ गए. रामगोपाल वर्मा (रंगीला), धर्मेश दर्शन (राजा हिन्दुस्तानी), विक्रम भट्‍ट (गुलाम), आशुतोष गोवारीकर (लगान), जॉन मैथ्‍यू मथान (सरफरोश), फरहान अख्तर (दिल चाहता है) के नाम गिनाए जा सकते हैं.

‘तारे जमीं पर’ निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म है. अमोल गुप्ते का काम आमिर को जब पसंद नहीं आया तो उन्होंने निर्देशन की कमान अपने हाथों में ली. इस फिल्म के जरिये आमिर ने बताया कि बच्चों पर उनके माता-पिताओं को अपने सपनों को नहीं थोपना चाहिए. जरुरत है बच्चों के नजरिये को समझने की. आमिर खान इस फिल्म में एकमात्र स्टार हैं और वे भी मध्यांतर के ठीक पहले स्क्रीन पर आते हैं. आमिर ने अपने कुशल निर्देशन से साबित किया कि बिना सेक्स, फूहड़ कॉमेडी और बिना स्टार्स के भी सफल फिल्म बनाई जा सकती है.

आमिर के काम करने का अपना एक ख़ास स्टाइल है. एक बार वे काम हाथ में लेते हैं तो उसके लिए वे दिन-रात एक कर देते हैं. वो अपने आप को पूरी तरह उसमें झोंक देते हैं. फिर चाहे वो छोटा-सा विज्ञापन हो या बड़े बजट की फीचर फिल्म. एक समय में एक ही फिल्म करना उन्हें पसंद है, जिसका अनुसरण अब बॉलीवुड के अन्य कलाकार भी करने लगे हैं. यही गुण उन्हें अपने समकालीन सभी अभिनेताओं से अलग करता है. या यूं कहें कि इस समय आमिर खान बॉलीवुड में अपनी शैली के अकेले अभिनेता हैं, जिनके लिए फिल्म केवल एक जूनून नहीं बल्कि जीने का एक सलीका भी है.

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