फिल्मों में भारी पड़ती नारी

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हाल ही में विद्याबालन अभिनीत रिलीज हुई फिल्म “तुम्हारी सुलु” की सफलता के बाद एक बार फिर ये बात साबित हो गई गयी कि फिल्मों में मुख्य भूमिका में अब सिर्फ हीरो ही नहीं बल्कि हीरोइने भी मुख्य भूमिका निभा सकती है. आज हम आपको ऐसी ही कुछ महिला प्रधान फिल्मों के बारे में बतायेगे जिसमे कई हिरोइनों मुख्य भूमिका निभाकर सुर्खिया बटोरी और इंडस्ट्री में एक नए ट्रेंड की शुरुआत ही कर डाली।


अमूमन फिल्मों में महिला किरदारों की स्थिति कहानी के शुरुआत और क्लाइमैक्स के बीच कुछ रोमांटिक, मनोरंजक पल जोड़ने भर की रहती आई है. पिछले पांच दशकों से हिंदी सिनेमा इसी ढर्रे पर आगे बढ़ता रहा है. पिछले कुछ सालों में हालात में जबरदस्त बदलाव देखा जा रहा है. अब परदे पर अभिनेत्रियां अबला नारी बनकर आंसू बहाने और रोमांस करने भर संतुष्ट नहीं हैं. अभिनेत्रियां अब कहानी में अपने वजूद के मायने तलाशना चाहती हैं. अब उन्हें केवल छुईमुई बने रहने से सख्त ऐतराज होने लगा है. विद्याबालन के अलावा कंगना रनौत, अनुष्का शर्मा, प्रियंका चोपड़ा और सोनाक्षी सिन्हा जैसी अभिनेत्रियों ने साबित किया कि भले ही बॉलीवुड अपने बनाए दायरे से निकलने में संकोच करता हो, लेकिन उन्हें जब भी मौक़ा मिलता है वो फिल्मों को अपने कंधे पर ढ़ोने का साहस दिखाती रही है.

‘रंगून’, ‘अकीरा’, ‘एनएच 10’ और ‘कहानी’ जैसी फ़िल्में बॉलीवुड में एक बड़े बदलाव का संकेत जरूर देती है, लेकिन बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों को देखकर तो ऐसा लगता है कि दिल्ली अभी दूर है. हकीकत यही है बॉलीवुड में महिला प्रधान फिल्में बनाना आसान नहीं हैं. महिला प्रधान फिल्मों के सफलता की उम्मीद आधी-आधी रहती है.
‘क्वीन’, ‘रिवाल्वर रानी’ जैसी महिला प्रधान फिल्मों से सफलता का स्वाद चखने वाली कंगना रनौत का कहना है कि, “ये एक परसेप्शन है कि दर्शक महिला प्रधान फ़िल्में नहीं देखना चाहते. अगर दर्शक देखते नहीं तो ऐसी फ़िल्में बनती कैसे हैं ? बॉलीवुड में भला कौन पैसे डुबाने के लिए फ़िल्में बनाता है ? कंगना पूछती हैं क्या ‘क्वीन’, ‘तनु वेड्स मनु’, ‘मर्दानी’ और ‘पिंक’ जैसी फ़िल्में नहीं चली ?”

हालात जो भी हों लेकिन अनुराग कश्यप, दिबाकर बैनर्जी, अब्बास मस्तान जैसे फिल्मकार इस चुनौती से दो-दो हाथ करने की कोशिशों में जुटे हैं. फिल्म ‘नाम शबाना’ में तापसी पन्नू ‘, ‘राब्ता’ में कीर्ति शेनन और ‘एक था टाइगर’ में कैटरीना कैफ जैसी खूबसूरत बालाओं को एक बला के रूप में दर्शाया गया. आखिर क्या वजह है कि कड़वे अनुभवों के बावजूद फिल्मकारों के हौसलों पर ज्यादा फर्क पड़ता दिखाई नहीं देता.

‘गंगाजल-2’ प्रकाश झा के लिए अच्छा अनुभव नहीं रहा. फिल्म में सारा बोझ प्रियंका चोपड़ा के कन्धों पर था. क्या यही फिल्म का माइनस पॉइंट साबित हुआ? हालाँकि प्रकाश झा इस सवाल का सामना करने से कतराते रहे, लेकिन बहुत कुरेदे जाने पर उन्होंने इतना जरूर कहा कि हालात जल्द बदलेंगे.
हालात वाकही बदल भी रहे हैं. पुरुष प्रधान फिल्मों के बीच पिछले कुछ सालों में कई अभिनेत्रियों ने परदे पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है. माधुरी दीक्षित, अनुष्का शर्मा, कंगना रनौत, रानी मुखर्जी सयानी गुप्ता और विद्याबालन जैसी अभिनेत्रियों ने अपने किरदारों से दर्शकों के एक बड़े वर्ग को इंस्पायर भी किया है. दर्शकों ने इस मुद्दे पर अपनी रजामंदी दे दी है. ये फिल्मकारों को तय करना है कि महिलाओं की इस बदलती भूमिका को वो फिल्मों में किस तरह पेश कर पाते हैं.

हालही में एक आयोजन में शामिल हुई विद्याबालन ने बताया था कि रोल में असफल होने के बाद मैं समझ गई कि मैं औरत के रोल के लिए ही पैदा हुई हूं. मैंने कभी नहीं सोचा कि मुझे कुछ अलग करना है. अपना अलग रास्ता बनाना है. जो मुझे अच्छा लगता है मैं वो करती हूं. जब मेरे ड्रेस पर चर्चा होती थी तब मुझे बहुत बुरा लगता था. जब मैं अपने पसंद की फिल्में करने लगी अपने पसंद के कपड़े पहनने लगी तब मैं दुनिया को भी अच्छी लगने लगी.

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