फिल्मों के लिए लाइफ सपोर्टर होते है सपोर्टिंग कलाकार

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प्रसिद्ध अभिनेता बोमन ईरानी का आज जन्म दिन है. 1959 में जन्मे ईरानी ने वर्ष 2000 से जोश फिल्म में सहायक कलाकार यानि सपोर्टिंग कलाकार के तौर पर अभिनय की शुरुआत की. आज हम आपको ऐसे ही कुछ सपोर्टिंग कलाकारों के बारे में बतायेगे जो मुख्य कलाकारों के साथ सिर्फ सहायक कलाकार ही नहीं बल्कि लाइफ सपोर्ट कलाकार की भूमिका में रहे। बता दे अब फिल्म में सपोर्टिंग कलाकार का ट्रेंड बदल चुका है तो इस बारे में क्या कहते है आज के फिल्म निर्देशक निर्माता और अभिनेता?

बोमन ईरानी

बोमन ईरानी की तरह कॉमेडी मजाकिया अभिनय करने वाले महमूद, जीवन, प्रेमनाथ और प्राण जैसे सपोर्टिंग कलाकारों का रूतबा इतना बड़ा होता था कि सफल से सफल अभिनेता भी इनके साथ फ़िल्में करने से घबराते थे. फिल्मों का मिजाज बदला तो प्रतिभाशाली कलाकार भी मात्र एक्स्ट्रा की भूमिका में बंधकर रह गए.

हीरो ने जब पूरी फिल्म को अपने कन्धों पर उठाना शुरू किया तो स्थिति और भी गंभीर हो गई. चरित्र अभिनेताओं की भूमिका केवल हीरो को उनकी हीरोगिरी चमकाने में मदद करने तक ही सीमित होकर रह गई. यही वजह है कि हीरो से अधिक प्रतिभाशाली होने के बावजूद इन अभिनेताओं को ख़ास तवज्जो नहीं मिली. हालात इतने बदतर हो गए कि आख़िरी दिनों में महमूद और जॉनी वॉकर जैसे अभिनेता भी कुछ फ्रेम में नजर आने के बाद गायब कर दिए जाने लगे.

शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ और रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘सत्या ने ‘शोले’ की परंपरा को फिर से बहाल करने में अहम् रोल अदा किया. ‘शोले’ का हर पात्र अपने आप में हीरो की हैसियत रखता है. ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘सत्या’ ने इस ट्रेंड को फिर से ज़िंदा किया. आज ये ट्रेंड पूरे शबाब पर है. संजय मिश्रा, राजेश शर्मा, सौरभ शुक्ला, विजेंद्र काला और सूरज शर्मा जैसे कलाकारों की उपस्थिति दर्शकों के लिए एक नया रोमांच पैदा कर देती है.

प्रकाश झा

इन दिनों चरित्र अभिनेताओं की लोकप्रियता का आलम ये है कि फिल्मकार इन अभिनेताओं के लिए अलग से रोल गढ़ने लगे हैं, जो लंबाई में भले ही छोटे हों लेकिन कद में हीरो पर भी भारी पड़ते नजर आते हैं. इस ट्रेंड को लेकर निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा का कहना है कि, “सपोर्टिंग कलाकार फिल्म की वो नींव होते हैं जिसपर हीरो अपने सपनों का महल खड़ा करता है. नींव जितनी मजबूत होगी निर्माण भी उतना ही मजबूत होगा.”

सपोर्टिंग कलाकार अब महज खानापूर्ति की चीज नहीं है, बल्कि ये फिल्मों के लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम की तरह साबित हो रहे हैं. पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ में अक्षय की एक्टिंग को दर्शक भले ही ज्यादा दिनों तक याद ना रख पाए लेकिन जज बने सौरभ शुक्ला और वकील बने अनु कपूर दर्शकों के दिमाग में लंबे समय तक बने रहे. संजय मिश्रा हमेशा अपने छोटे से रोल के बावजूद पूरे कैनवास पर छा जाते हैं. ‘जब वी मेट’ में टैक्सी चालक के रोल विजेंद्र काला ने इतने दमदार तरीके से निभाया कि लोग आज भी उन्हें याद कर मुस्कुरा जरूर देते हैं.

जॉनी वाकर

आज हर तीसरी फिल्म में उनकी मौजूदगी अनिवार्य सी हो गई है. ‘बजरंगी भाई जान’, ‘इश्किया’ और ‘एम एस धोनी’ जैसी कई फिल्मों के जरिए राजेश शर्मा अब अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ में सोमदत्त बने साहिल वैद्य को वरुण धवन से ज्यादा प्रशंसा मिली. अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘फिल्लौरी’ में अनुष्का से ज्यादा चर्चा सूरज शर्मा की हुई. ‘लाइफ ऑफ पाइ’ से लाइमलाइट में आए सूरज शर्मा ‘फिल्लौरी’ का अतिरिक्त आकर्षण हैं, जबकि हीरो के रोल में दिलजीत दोसांझ हैं.

राजेश शर्मा

इन सपोर्टिंग कलाकारों को लेकर निर्देशकों की अतिरिक्त मेहनत साफ़ दिखाई देती है. इसकी वजह बताते हुए अभिनेता मनोज बाजपेयी कहते हैं कि, “फिल्मकारों की सोच अब बदली है. पहले स्टार्स के लिए फ़िल्में बनती थी और बाकी कलाकार जोकर की तरह उनके आस-पास मंडराते नजर आते थे. अब कहानी खुद तय करती है कि किस कलाकार को कितनी अहमियत मिलनी चाहिए. प्रतिभा को तो बस मौक़ा चाहिए.”

नवाजुद्दीन सिद्दीकी

सपोर्टिंग रोल्स के जरिए ही बॉलीवुड पर छाए नवाजुद्दीन सिद्दीकी के मुताबिक़, “सोच सिर्फ निर्देशकों की ही नहीं अभिनेताओं की भी बदली है. पहले बड़े कलाकारों पर सपोर्टिंग कलाकारों के रोल्स कटवाने या हटाने के तोहमत लगते थे, जबकि आज बड़े स्टार्स ऐसे कलाकारों के लिए खास तौर पैरवी करते हैं. सलमान खान और शाहरुख खान जैसे स्टार्स के सोच का ही नतीजा है कि कई बार खुद उनके रोल्स को बढ़वाया गया है.”

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